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School of Vedic Sciences, FORE

पंचांग · गोचर · गुरु (बृहस्पति)

2032 में गुरु (बृहस्पति) का गोचर

2032 में गुरु (बृहस्पति) 3 बार राशि बदलता है: 4 मार्च को मकर, 12 अगस्त को धनु (वक्री, पीछे की ओर), 23 अक्टूबर को मकर। वक्री: 19 मई से।

सभी समय सैन होज़े के स्थानीय समय (America/Los Angeles, PST/PDT) में।

2032 में गुरु (बृहस्पति) किन राशियों में है

  1. धनु15 अक्टूबर, रात 2:31 2031 → 4 मार्च, रात 11:44 2032· लगभग 5 महीने
  2. मकर4 मार्च, रात 11:44 2032 → 12 अगस्त, सुबह 8:42 2032· लगभग 5 महीने
  3. धनु(वक्री गति से प्रवेश)12 अगस्त, सुबह 8:42 2032 → 23 अक्टूबर, सुबह 7:28 2032· लगभग 2 महीने
  4. मकर23 अक्टूबर, सुबह 7:28 2032 → 17 मार्च, दोपहर 1:29 2033· लगभग 5 महीने

तारीखवार

सभी समय सैन होज़े के स्थानीय समय (America/Los Angeles, PST/PDT) में।

जनवरी 2032

  • 14 जनवरीरात 10:33

    गुरु (बृहस्पति) का उदय (अस्त समाप्त)†

मार्च 2032

  • 4 मार्चरात 11:44

    गुरु (बृहस्पति) का मकर में प्रवेश

मई 2032

  • 19 मईसुबह 7:30

    गुरु (बृहस्पति) मकर 7°50′ पर वक्री

अगस्त 2032

  • 12 अगस्तसुबह 8:42

    गुरु (बृहस्पति) का धनु में प्रवेश (वक्री गति से)

सितंबर 2032

  • 17 सितंबरदोपहर 1:09

    गुरु (बृहस्पति) धनु 28°00′ पर मार्गी

अक्टूबर 2032

  • 23 अक्टूबरसुबह 7:28

    गुरु (बृहस्पति) का मकर में प्रवेश

† परम्परा के अनुसार भिन्नता। यहाँ गुरु (बृहस्पति) को सूर्य से 11° के भीतर अस्त माना गया है (सूर्य सिद्धान्त); कुछ पंचांग अन्य सीमा या दृश्यता का नियम लेते हैं।

यह भी देखें: गुरु (बृहस्पति) (शब्दकोश) · गोचर 2032: सभी ग्रह · अपनी कुंडली पर गोचर

समझें

गोचर क्या है

गोचर का अर्थ है ग्रहों का चलना: आकाश में हर ग्रह राशि-चक्र में आगे बढ़ता है, और जब वह एक राशि की सीमा पार करता है तो उसे उस ग्रह का राशि परिवर्तन (संक्रमण) कहते हैं। यह पृष्ठ केवल वही बताता है कि कौन-सा ग्रह कब कहाँ है। शास्त्रीय पद्धति में गोचर को व्यक्ति की जन्म-राशि (चन्द्र राशि) से गिनकर पढ़ा जाता है; अपनी कुंडली पर आज का गोचर देखने के लिए गोचर उपकरण खोलें।

वक्री और मार्गी

पृथ्वी से देखने पर मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि कभी-कभी कुछ समय के लिए पीछे की ओर चलते दिखते हैं। इसे वक्री गति कहते हैं; जिस क्षण ग्रह रुककर मुड़ता है वह स्तम्भन (स्टेशन) है, और फिर आगे बढ़ना मार्गी होना। यह पृथ्वी और ग्रह की कक्षाओं की सापेक्ष गति का दृश्य प्रभाव है। सूर्य और चन्द्रमा कभी वक्री नहीं होते; राहु-केतु (मध्यम) सदा पीछे चलते हैं।

अस्त (दहन)

जब कोई ग्रह सूर्य के बहुत पास होता है तो सूर्य की चमक में वह दिखाई नहीं देता; ग्रंथ इसे अस्त कहते हैं, और फिर दिखने लगना उदय। सूर्य सिद्धान्त हर ग्रह के लिए दूरी की सीमा देता है। यहाँ प्रयुक्त सीमाएँ: मंगल 17°, बुध 14° (वक्री में 12°), गुरु 11°, शुक्र 10° (वक्री में 8°), शनि 15°। पंचांग गुरु और शुक्र के अस्त-काल को विवाह जैसे संस्कारों के मुहूर्त में छोड़ते हैं।

निरयण राशियाँ

भारतीय पंचांग राशियों को तारों के सापेक्ष (निरयण) गिनते हैं। पश्चिमी (सायन) राशियाँ इनसे लगभग 24° आगे हैं, इसलिए वहाँ छपी तारीखें यहाँ से लगभग तीन सप्ताह पहले की होती हैं। यहाँ लाहिरी अयनांश प्रयुक्त है।

यह गणना कैसे हुई

NASA JPL के DE421 आँकड़ों से हर ग्रह की स्पष्ट भू-केन्द्रीय स्थिति, लाहिरी अयनांश घटाकर। राशि-सीमा पार करने, गति शून्य होने और सूर्य से दूरी सीमा के बराबर होने के क्षण द्विभाजन (bisection) से एक सेकंड से कम की शुद्धता तक निकाले गए हैं। अयनांश के छोटे अन्तर से धीमे ग्रहों (विशेषकर शनि) का समय दूसरे पंचांगों से कुछ घंटे अलग हो सकता है।

पंचांग में और