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School of Vedic Sciences, FORE

पंचांग · गोचर · गुरु (बृहस्पति)

2049 में गुरु (बृहस्पति) का गोचर

2049 में गुरु (बृहस्पति) 2 बार राशि बदलता है: 3 अप्रैल को मिथुन, 27 अगस्त को कर्क। वक्री: 20 नवंबर से।

सभी समय क्वालालंपुर के स्थानीय समय (Asia/Kuala Lumpur, UTC+8) में।

2049 में गुरु (बृहस्पति) किन राशियों में है

  1. वृषभ(वक्री गति से प्रवेश)28 दिसंबर, रात 2:36 2048 → 3 अप्रैल, दोपहर 2:43 2049· लगभग 3 महीने
  2. मिथुन3 अप्रैल, दोपहर 2:43 2049 → 27 अगस्त, दोपहर 2:25 2049· लगभग 5 महीने
  3. कर्क27 अगस्त, दोपहर 2:25 2049 → 8 मार्च, सुबह 9:04 2050· लगभग 6 महीने

तारीखवार

सभी समय क्वालालंपुर के स्थानीय समय (Asia/Kuala Lumpur, UTC+8) में।

फ़रवरी 2049

  • 14 फ़रवरीसुबह 8:40

    गुरु (बृहस्पति) वृषभ 26°25′ पर मार्गी

अप्रैल 2049

  • 3 अप्रैलदोपहर 2:43

    गुरु (बृहस्पति) का मिथुन में प्रवेश

जून 2049

  • 19 जूनदोपहर 3:05

    गुरु (बृहस्पति) अस्त (19 जुलाई तक)†

जुलाई 2049

  • 19 जुलाईरात 8:27

    गुरु (बृहस्पति) का उदय (अस्त समाप्त)†

अगस्त 2049

  • 27 अगस्तदोपहर 2:25

    गुरु (बृहस्पति) का कर्क में प्रवेश

नवंबर 2049

  • 20 नवंबररात 8:24

    गुरु (बृहस्पति) कर्क 9°49′ पर वक्री

† परम्परा के अनुसार भिन्नता। यहाँ गुरु (बृहस्पति) को सूर्य से 11° के भीतर अस्त माना गया है (सूर्य सिद्धान्त); कुछ पंचांग अन्य सीमा या दृश्यता का नियम लेते हैं।

यह भी देखें: गुरु (बृहस्पति) (शब्दकोश) · गोचर 2049: सभी ग्रह · अपनी कुंडली पर गोचर

समझें

गोचर क्या है

गोचर का अर्थ है ग्रहों का चलना: आकाश में हर ग्रह राशि-चक्र में आगे बढ़ता है, और जब वह एक राशि की सीमा पार करता है तो उसे उस ग्रह का राशि परिवर्तन (संक्रमण) कहते हैं। यह पृष्ठ केवल वही बताता है कि कौन-सा ग्रह कब कहाँ है। शास्त्रीय पद्धति में गोचर को व्यक्ति की जन्म-राशि (चन्द्र राशि) से गिनकर पढ़ा जाता है; अपनी कुंडली पर आज का गोचर देखने के लिए गोचर उपकरण खोलें।

वक्री और मार्गी

पृथ्वी से देखने पर मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि कभी-कभी कुछ समय के लिए पीछे की ओर चलते दिखते हैं। इसे वक्री गति कहते हैं; जिस क्षण ग्रह रुककर मुड़ता है वह स्तम्भन (स्टेशन) है, और फिर आगे बढ़ना मार्गी होना। यह पृथ्वी और ग्रह की कक्षाओं की सापेक्ष गति का दृश्य प्रभाव है। सूर्य और चन्द्रमा कभी वक्री नहीं होते; राहु-केतु (मध्यम) सदा पीछे चलते हैं।

अस्त (दहन)

जब कोई ग्रह सूर्य के बहुत पास होता है तो सूर्य की चमक में वह दिखाई नहीं देता; ग्रंथ इसे अस्त कहते हैं, और फिर दिखने लगना उदय। सूर्य सिद्धान्त हर ग्रह के लिए दूरी की सीमा देता है। यहाँ प्रयुक्त सीमाएँ: मंगल 17°, बुध 14° (वक्री में 12°), गुरु 11°, शुक्र 10° (वक्री में 8°), शनि 15°। पंचांग गुरु और शुक्र के अस्त-काल को विवाह जैसे संस्कारों के मुहूर्त में छोड़ते हैं।

निरयण राशियाँ

भारतीय पंचांग राशियों को तारों के सापेक्ष (निरयण) गिनते हैं। पश्चिमी (सायन) राशियाँ इनसे लगभग 24° आगे हैं, इसलिए वहाँ छपी तारीखें यहाँ से लगभग तीन सप्ताह पहले की होती हैं। यहाँ लाहिरी अयनांश प्रयुक्त है।

यह गणना कैसे हुई

NASA JPL के DE421 आँकड़ों से हर ग्रह की स्पष्ट भू-केन्द्रीय स्थिति, लाहिरी अयनांश घटाकर। राशि-सीमा पार करने, गति शून्य होने और सूर्य से दूरी सीमा के बराबर होने के क्षण द्विभाजन (bisection) से एक सेकंड से कम की शुद्धता तक निकाले गए हैं। अयनांश के छोटे अन्तर से धीमे ग्रहों (विशेषकर शनि) का समय दूसरे पंचांगों से कुछ घंटे अलग हो सकता है।

पंचांग में और