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School of Vedic Sciences, FORE

पंचांग · गोचर · शुक्र

2047 में शुक्र का गोचर

2047 में शुक्र 10 बार राशि बदलता है: 20 जनवरी को कुम्भ, 14 फ़रवरी को मीन, 10 मार्च को मेष, 4 अप्रैल को वृषभ …। वक्री: 15 जुलाई से।

सभी समय सिएटल के स्थानीय समय (America/Los Angeles, PST/PDT) में।

2047 में शुक्र किन राशियों में है

  1. मकर27 दिसंबर, शाम 6:38 2046 → 20 जनवरी, शाम 7:03 2047· 24 दिन
  2. कुम्भ20 जनवरी, शाम 7:03 2047 → 14 फ़रवरी, रात 12:04 2047· 24 दिन
  3. मीन14 फ़रवरी, रात 12:04 2047 → 10 मार्च, दोपहर 3:07 2047· 25 दिन
  4. मेष10 मार्च, दोपहर 3:07 2047 → 4 अप्रैल, रात 8:52 2047· 25 दिन
  5. वृषभ4 अप्रैल, रात 8:52 2047 → 1 मई, सुबह 6:42 2047· 26 दिन
  6. मिथुन1 मई, सुबह 6:42 2047 → 30 मई, सुबह 8:37 2047· 29 दिन
  7. कर्क30 मई, सुबह 8:37 2047 → 3 अक्टूबर, रात 2:22 2047· लगभग 4 महीने
  8. सिंह3 अक्टूबर, रात 2:22 2047 → 2 नवंबर, सुबह 6:25 2047· 30 दिन
  9. कन्या2 नवंबर, सुबह 6:25 2047 → 28 नवंबर, दोपहर 2:01 2047· 26 दिन
  10. तुला28 नवंबर, दोपहर 2:01 2047 → 23 दिसंबर, दोपहर 3:00 2047· 25 दिन
  11. वृश्चिक23 दिसंबर, दोपहर 3:00 2047 → 17 जनवरी, रात 2:42 2048· 24 दिन

तारीखवार

सभी समय सिएटल के स्थानीय समय (America/Los Angeles, PST/PDT) में।

जनवरी 2047

  • 20 जनवरीशाम 7:03

    शुक्र का कुम्भ में प्रवेश

फ़रवरी 2047

  • 14 फ़रवरीरात 12:04

    शुक्र का मीन में प्रवेश

मार्च 2047

  • 10 मार्चदोपहर 3:07

    शुक्र का मेष में प्रवेश

अप्रैल 2047

  • 4 अप्रैलरात 8:52

    शुक्र का वृषभ में प्रवेश

मई 2047

  • 1 मईसुबह 6:42

    शुक्र का मिथुन में प्रवेश

  • 30 मईसुबह 8:37

    शुक्र का कर्क में प्रवेश

जुलाई 2047

  • 15 जुलाईशाम 4:45

    शुक्र कर्क 27°35′ पर वक्री

अगस्त 2047

  • 1 अगस्तरात 1:14

    शुक्र अस्त (11 अगस्त तक)†

  • 11 अगस्तसुबह 6:37

    शुक्र का उदय (अस्त समाप्त)†

  • 27 अगस्तशाम 7:08

    शुक्र कर्क 11°10′ पर मार्गी

अक्टूबर 2047

  • 3 अक्टूबररात 2:22

    शुक्र का सिंह में प्रवेश

नवंबर 2047

  • 2 नवंबरसुबह 6:25

    शुक्र का कन्या में प्रवेश

  • 28 नवंबरदोपहर 2:01

    शुक्र का तुला में प्रवेश

दिसंबर 2047

  • 23 दिसंबरदोपहर 3:00

    शुक्र का वृश्चिक में प्रवेश

† परम्परा के अनुसार भिन्नता। यहाँ शुक्र को सूर्य से 10° (वक्री में 8°) के भीतर अस्त माना गया है (सूर्य सिद्धान्त); कुछ पंचांग अन्य सीमा या दृश्यता का नियम लेते हैं।

यह भी देखें: शुक्र (शब्दकोश) · गोचर 2047: सभी ग्रह · अपनी कुंडली पर गोचर

समझें

गोचर क्या है

गोचर का अर्थ है ग्रहों का चलना: आकाश में हर ग्रह राशि-चक्र में आगे बढ़ता है, और जब वह एक राशि की सीमा पार करता है तो उसे उस ग्रह का राशि परिवर्तन (संक्रमण) कहते हैं। यह पृष्ठ केवल वही बताता है कि कौन-सा ग्रह कब कहाँ है। शास्त्रीय पद्धति में गोचर को व्यक्ति की जन्म-राशि (चन्द्र राशि) से गिनकर पढ़ा जाता है; अपनी कुंडली पर आज का गोचर देखने के लिए गोचर उपकरण खोलें।

वक्री और मार्गी

पृथ्वी से देखने पर मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि कभी-कभी कुछ समय के लिए पीछे की ओर चलते दिखते हैं। इसे वक्री गति कहते हैं; जिस क्षण ग्रह रुककर मुड़ता है वह स्तम्भन (स्टेशन) है, और फिर आगे बढ़ना मार्गी होना। यह पृथ्वी और ग्रह की कक्षाओं की सापेक्ष गति का दृश्य प्रभाव है। सूर्य और चन्द्रमा कभी वक्री नहीं होते; राहु-केतु (मध्यम) सदा पीछे चलते हैं।

अस्त (दहन)

जब कोई ग्रह सूर्य के बहुत पास होता है तो सूर्य की चमक में वह दिखाई नहीं देता; ग्रंथ इसे अस्त कहते हैं, और फिर दिखने लगना उदय। सूर्य सिद्धान्त हर ग्रह के लिए दूरी की सीमा देता है। यहाँ प्रयुक्त सीमाएँ: मंगल 17°, बुध 14° (वक्री में 12°), गुरु 11°, शुक्र 10° (वक्री में 8°), शनि 15°। पंचांग गुरु और शुक्र के अस्त-काल को विवाह जैसे संस्कारों के मुहूर्त में छोड़ते हैं।

निरयण राशियाँ

भारतीय पंचांग राशियों को तारों के सापेक्ष (निरयण) गिनते हैं। पश्चिमी (सायन) राशियाँ इनसे लगभग 24° आगे हैं, इसलिए वहाँ छपी तारीखें यहाँ से लगभग तीन सप्ताह पहले की होती हैं। यहाँ लाहिरी अयनांश प्रयुक्त है।

यह गणना कैसे हुई

NASA JPL के DE421 आँकड़ों से हर ग्रह की स्पष्ट भू-केन्द्रीय स्थिति, लाहिरी अयनांश घटाकर। राशि-सीमा पार करने, गति शून्य होने और सूर्य से दूरी सीमा के बराबर होने के क्षण द्विभाजन (bisection) से एक सेकंड से कम की शुद्धता तक निकाले गए हैं। अयनांश के छोटे अन्तर से धीमे ग्रहों (विशेषकर शनि) का समय दूसरे पंचांगों से कुछ घंटे अलग हो सकता है।

पंचांग में और