पंचांग · गोचर · मंगल
1981 में मंगल का गोचर
1981 में मंगल 8 बार राशि बदलता है: 30 जनवरी को कुम्भ, 9 मार्च को मीन, 17 अप्रैल को मेष, 27 मई को वृषभ …।
1981 में मंगल किन राशियों में है
- मकर22 दिसंबर, रात 11:09 1980 → 30 जनवरी, रात 1:50 1981· 38 दिन
- कुम्भ30 जनवरी, रात 1:50 1981 → 9 मार्च, रात 3:04 1981· 38 दिन
- मीन9 मार्च, रात 3:04 1981 → 17 अप्रैल, रात 12:49 1981· 39 दिन
- मेष17 अप्रैल, रात 12:49 1981 → 27 मई, दोपहर 1:04 1981· 41 दिन
- वृषभ27 मई, दोपहर 1:04 1981 → 9 जुलाई, सुबह 4:24 1981· 43 दिन
- मिथुन9 जुलाई, सुबह 4:24 1981 → 23 अगस्त, सुबह 7:34 1981· 45 दिन
- कर्क23 अगस्त, सुबह 7:34 1981 → 10 अक्टूबर, सुबह 11:46 1981· 48 दिन
- सिंह10 अक्टूबर, सुबह 11:46 1981 → 3 दिसंबर, सुबह 4:04 1981· 54 दिन
- कन्या3 दिसंबर, सुबह 4:04 1981 → 23 जुलाई, रात 2:53 1982· लगभग 8 महीने
तारीखवार
समय भारतीय मानक समय (IST) में।
जनवरी 1981
15 जनवरीदोपहर 3:31
मंगल अस्त (15 जून तक)†
30 जनवरीरात 1:50
मंगल का कुम्भ में प्रवेश
मार्च 1981
9 मार्चरात 3:04
मंगल का मीन में प्रवेश
अप्रैल 1981
17 अप्रैलरात 12:49
मंगल का मेष में प्रवेश
मई 1981
27 मईदोपहर 1:04
मंगल का वृषभ में प्रवेश
जून 1981
15 जूनशाम 6:27
मंगल का उदय (अस्त समाप्त)†
जुलाई 1981
9 जुलाईसुबह 4:24
मंगल का मिथुन में प्रवेश
अगस्त 1981
23 अगस्तसुबह 7:34
मंगल का कर्क में प्रवेश
अक्टूबर 1981
10 अक्टूबरसुबह 11:46
मंगल का सिंह में प्रवेश
दिसंबर 1981
3 दिसंबरसुबह 4:04
मंगल का कन्या में प्रवेश
† परम्परा के अनुसार भिन्नता। यहाँ मंगल को सूर्य से 17° के भीतर अस्त माना गया है (सूर्य सिद्धान्त); कुछ पंचांग अन्य सीमा या दृश्यता का नियम लेते हैं।
यह भी देखें: मंगल (शब्दकोश) · गोचर 1981: सभी ग्रह · अपनी कुंडली पर गोचर
समझें
गोचर क्या है
गोचर का अर्थ है ग्रहों का चलना: आकाश में हर ग्रह राशि-चक्र में आगे बढ़ता है, और जब वह एक राशि की सीमा पार करता है तो उसे उस ग्रह का राशि परिवर्तन (संक्रमण) कहते हैं। यह पृष्ठ केवल वही बताता है कि कौन-सा ग्रह कब कहाँ है। शास्त्रीय पद्धति में गोचर को व्यक्ति की जन्म-राशि (चन्द्र राशि) से गिनकर पढ़ा जाता है; अपनी कुंडली पर आज का गोचर देखने के लिए गोचर उपकरण खोलें।
वक्री और मार्गी
पृथ्वी से देखने पर मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि कभी-कभी कुछ समय के लिए पीछे की ओर चलते दिखते हैं। इसे वक्री गति कहते हैं; जिस क्षण ग्रह रुककर मुड़ता है वह स्तम्भन (स्टेशन) है, और फिर आगे बढ़ना मार्गी होना। यह पृथ्वी और ग्रह की कक्षाओं की सापेक्ष गति का दृश्य प्रभाव है। सूर्य और चन्द्रमा कभी वक्री नहीं होते; राहु-केतु (मध्यम) सदा पीछे चलते हैं।
अस्त (दहन)
जब कोई ग्रह सूर्य के बहुत पास होता है तो सूर्य की चमक में वह दिखाई नहीं देता; ग्रंथ इसे अस्त कहते हैं, और फिर दिखने लगना उदय। सूर्य सिद्धान्त हर ग्रह के लिए दूरी की सीमा देता है। यहाँ प्रयुक्त सीमाएँ: मंगल 17°, बुध 14° (वक्री में 12°), गुरु 11°, शुक्र 10° (वक्री में 8°), शनि 15°। पंचांग गुरु और शुक्र के अस्त-काल को विवाह जैसे संस्कारों के मुहूर्त में छोड़ते हैं।
निरयण राशियाँ
भारतीय पंचांग राशियों को तारों के सापेक्ष (निरयण) गिनते हैं। पश्चिमी (सायन) राशियाँ इनसे लगभग 24° आगे हैं, इसलिए वहाँ छपी तारीखें यहाँ से लगभग तीन सप्ताह पहले की होती हैं। यहाँ लाहिरी अयनांश प्रयुक्त है।
यह गणना कैसे हुई
NASA JPL के DE421 आँकड़ों से हर ग्रह की स्पष्ट भू-केन्द्रीय स्थिति, लाहिरी अयनांश घटाकर। राशि-सीमा पार करने, गति शून्य होने और सूर्य से दूरी सीमा के बराबर होने के क्षण द्विभाजन (bisection) से एक सेकंड से कम की शुद्धता तक निकाले गए हैं। अयनांश के छोटे अन्तर से धीमे ग्रहों (विशेषकर शनि) का समय दूसरे पंचांगों से कुछ घंटे अलग हो सकता है।
पंचांग में और
- आजआज के पाँच अंग, शुभ-अशुभ समय और चौघड़िया।
- मासिक कैलेंडरपूरे मास की तिथियाँ, नक्षत्र और पर्व।
- पर्व और व्रतवर्ष भर के पर्व, व्रत, एकादशी और पूर्णिमा।
- मुहूर्त खोजेंरोज़ के कामों के लिए शुभ समय, कारण सहित।
- चौघड़ियादिन-रात के आठ-आठ भाग, अभी कौन-सा चल रहा है।
- राहु कालआज का राहु काल, गुलिक और यमगण्ड।
- पंचकआने वाले महीनों के पंचक, और ग्रंथ इनके बारे में क्या कहते हैं।
- भद्राभद्रा (विष्टि करण) कब है और उसका वास कहाँ है।
- संक्रान्तिवर्ष की बारह संक्रान्तियाँ, समय और पुण्य काल सहित।
- ग्रहणवर्ष के सूर्य और चन्द्र ग्रहण, स्पर्श-मोक्ष के समय और सूतक।
- तिथि परिवर्तककिसी भी अंग्रेज़ी तारीख की हिन्दू तिथि।
- जन्म तिथिअपनी जन्म तिथि और अगले वर्षों की तारीखें।
- नामाक्षरनक्षत्र-पद के अनुसार नाम के आरम्भिक अक्षर।
