ग्रंथ-संग्रह · सिद्धांत
Āryabhaṭīya
आर्यभटीय
- रचयिता
- आर्यभट
- काल
- 499 ईस्वी (लेखक उस वर्ष के संदर्भ में अपनी आयु बताते हैं)
- परंपरा
- सिद्धांत
सार
चार भागों में एक छोटा और सघन ग्रंथ, जिसमें अक्षरों पर आधारित संख्या-संकेत, गणित, कालक्रिया (काल-गणना) और गोल (गोलीय खगोल) आते हैं। यह पृथ्वी के दैनिक घूर्णन का प्रस्ताव रखता है और ज्या-सारणी तथा ग्रह-गणना की विधियाँ देता है। इसने आर्यभट-संप्रदाय को आकार दिया, जो आगे चलकर केरल में फला-फूला।
संरचना
चार खंडों में 121 श्लोक: गीतिकापाद, गणितपाद, कालक्रियापाद, गोलपाद।
कहाँ पढ़ें
के. एस. शुक्ल और के. वी. शर्मा (K. S. Shukla, K. V. Sarma) का अनुवाद सहित समीक्षित संस्करण (भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी, 1976); डब्ल्यू. ई. क्लार्क (W. E. Clark) का अंग्रेज़ी अनुवाद (1930)।
