ग्रंथ-संग्रह
ग्रंथ-संग्रह: होरा
वैदिक विज्ञानों के आधारभूत शास्त्रीय ग्रंथों की सूची: हर ग्रंथ का विषय, उसकी संरचना, और उसे पढ़ने के लिए संस्करण और अनुवाद।
Bṛhat Pārāśara Horāśāstra
बृहत्पाराशरहोराशास्त्र
आधुनिक भारत में होरा का सबसे अधिक प्रयुक्त ग्रंथ, जो पराशर और उनके शिष्य मैत्रेय के संवाद के रूप में रचा गया है। इसमें राशि, ग्रह, भाव, वर्ग-कुंडलियाँ, योग, विंशोत्तरी तथा अन्य दशा-पद्धतियाँ, और उपाय-विषयक अध्याय आते हैं। डेविड पिंग्री जैसे विद्वानों ने ध्यान दिलाया है कि प्रचलित पाठ आरंभिक टीकाकारों द्वारा उद्धृत प्राचीन पराशर से काफ़ी भिन्न है, इसलिए हम इसे एक जीवंत, विकसित होते संकलन के रूप में पढ़ते हैं।
- रचयिता
- ऋषि पराशर को आरोपित
- काल
- संकलित रूप की तिथि अनिश्चित; मुद्रित पाठ को सामान्यतः उत्तर-मध्यकालीन माना जाता है (काल-निर्धारण विवादित)
- परंपरा
- होरा
Bṛhajjātaka
बृहज्जातक
जन्म-कुंडली पर वराहमिहिर का संक्षिप्त किंतु कठिन ग्रंथ, जो पूर्ववर्ती यवन (यूनानी)-प्रभावित और भारतीय होरा को सघन श्लोकों में समेटता है। इसमें राशियों, ग्रहों और उनके बल की परिभाषा है, और योग, आयु तथा ग्रह-स्थितियों के फल की चर्चा है। भट्टोत्पल (दसवीं शती) की टीका इसकी मानक सहचर बन गई।
- रचयिता
- वराहमिहिर
- काल
- छठी शती ईस्वी
- परंपरा
- होरा
Phaladīpikā
फलदीपिका
फलों का व्यावहारिक ग्रंथ, 'फल का दीपक', जो ग्रहों, भावों और योगों के क्रम में व्यवस्थित है। ग्रह-बल की स्पष्ट परिभाषाओं और दशा तथा गोचर के अध्यायों के लिए इसे महत्त्व दिया जाता है। इसकी शैली वराहमिहिर की शैली से अधिक सुगम है और यह शिक्षकों में आज भी लोकप्रिय है।
- रचयिता
- मन्त्रेश्वर
- काल
- मध्यकालीन दक्षिण भारत; प्रस्तावित तिथियाँ तेरहवीं से सोलहवीं शती तक (काल-निर्धारण विवादित)
- परंपरा
- होरा
Sārāvalī
सारावली
होरा का विशाल संग्रह, जो वराहमिहिर और पूर्ववर्ती यवन सामग्री का विस्तार करता है और ग्रह-स्थितियों तथा योगों के फलों के अनेक विस्तृत वर्णन देता है। कल्याणवर्मा स्वयं कहते हैं कि उन्होंने अनेक पुराने ग्रंथों का सहारा लिया। योगों की व्यापकता के कारण इसे प्रायः देखा जाता है।
- रचयिता
- कल्याणवर्मा
- काल
- लगभग नौवीं–दसवीं शती ईस्वी (काल-निर्धारण विवादित)
- परंपरा
- होरा
Jātakapārijāta
जातकपारिजात
एक व्यवस्थित परवर्ती संकलन, जो राशि, ग्रह, भाव, योग और दशा पर पूर्व आचार्यों के नियमों को एकत्र करता है। इसका योग-अध्याय और भावेशों का विवेचन प्रायः उद्धृत होते हैं। यह दिखाता है कि उत्तर-मध्यकाल में परंपरा कैसे सुदृढ़ हुई।
- रचयिता
- वैद्यनाथ दीक्षित
- काल
- लगभग पंद्रहवीं शती ईस्वी (काल-निर्धारण विवादित)
- परंपरा
- होरा
Jaimini Sūtra (Upadeśa Sūtra)
जैमिनिसूत्र
सूत्रों का संक्षिप्त संग्रह, जो होरा की एक भिन्न पद्धति प्रस्तुत करता है: राशि-आधारित दृष्टि, चर कारक (परिवर्तनशील कारक) और चर दशा जैसी राशि-आधारित दशाएँ। सूत्र कटपयादि नामक अक्षर-संख्या संकेत का प्रयोग करते हैं, जिससे टीकाएँ अनिवार्य हो जाती हैं। विभिन्न टीका-परंपराएँ इन्हें काफ़ी अलग-अलग ढंग से पढ़ती हैं।
- रचयिता
- जैमिनि को आरोपित
- काल
- तिथि अनिश्चित (काल-निर्धारण विवादित)
- परंपरा
- होरा
